श्वसन कार्यिकी एवं क्रियाविधि - सम्पूर्ण नोट्स

श्वसन कार्यिकी (Respiratory Physiology)

फुफ्फुसीय वेंटिलेशन | श्वसन की चरणबद्ध क्रियाविधि | श्वसन आयतन एवं क्षमताएँ

1. फुफ्फुसीय वेंटिलेशन (Pulmonary Ventilation)

फेफड़ों में वायु के अंदर आने और बाहर जाने की प्रक्रिया को फुफ्फुसीय वेंटिलेशन कहते हैं। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से दो अवस्थाओं में होती है—अंतःश्वसन (Inspiration) और उच्छ्वसन (Expiration)। इसका मुख्य उद्देश्य वायुकोष्ठिकाओं तक ताजी वायु पहुँचाना तथा CO₂ युक्त वायु को बाहर निकालना है। यह वक्ष गुहा के आयतन तथा फेफड़ों के दाब में परिवर्तन पर निर्भर करती है।

2. अंतःश्वसन एवं उच्छ्वसन (Inspiration & Expiration)

अंतःश्वसन (सक्रिय प्रक्रिया): डायाफ्राम संकुचित होकर नीचे चपटा होता है तथा बाह्य इंटरकॉस्टल मांसपेशियाँ पसलियों को ऊपर व बाहर खींचती हैं। वक्ष गुहा का आयतन बढ़ने से फेफड़ों का दाब वायुमंडलीय दाब से कम हो जाता है, जिससे वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है।

उच्छ्वसन (निष्क्रिय प्रक्रिया): डायाफ्राम शिथिल होकर ऊपर गुंबदाकार हो जाता है और बाह्य इंटरकॉस्टल मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। वक्ष गुहा का आयतन घटने से फेफड़ों का दाब बढ़ जाता है और वायु बाहर निकल जाती है।

3. डायाफ्राम की भूमिका एवं गैसों का विनिमय

डायाफ्राम: यह वक्ष व उदर गुहा के बीच स्थित प्राथमिक पेशी है जो वक्ष गुहा के आयतन में फेरबदल कर वायु-दाब नियंत्रित करती है।

गैसों का आदान-प्रदान: Alveoli में ऑक्सीजन का आंशिक दाब अधिक होने से O₂ विसरण द्वारा रक्त में जाती है तथा रक्त से CO₂ विसरित होकर Alveoli में आती है।

4. श्वसन का नियंत्रण (Regulation of Respiration)

श्वसन दर का नियंत्रण मस्तिष्क के मेडुला ऑब्लोंगाटा और पोंस में स्थित श्वसन केंद्रों द्वारा होता है। रक्त में CO₂ की मात्रा बढ़ने पर pH घटता है, जिससे श्वसन केंद्र उत्तेजित होकर श्वसन दर व गहराई बढ़ा देते हैं।

श्वसन की क्रियाविधि (चरणबद्ध सचित्र वर्णन)

इमेज आरेख एवं प्रत्येक चरण का विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण

⭐ याद रखने की ट्रिक: वायु प्रवेश → डायाफ्राम संकुचन → वक्ष आयतन ↑ → फेफड़ों का दाब ↓ → Alveoli में गैस विनिमय → O₂ ऊतकों तक → CO₂ फेफड़ों तक → डायाफ्राम शिथिल → वक्ष आयतन ↓ → CO₂ बाहर।
चरण 1
चरण 1 – वायु का प्रवेश अंतःश्वसन के समय नासिका द्वारा वायु शरीर के अंदर प्रवेश करती है और नासिका गुहा, ग्रसनी, कंठ तथा श्वासनली से होकर ब्रॉन्काई एवं ब्रॉन्किओल्स के रास्ते फेफड़ों की वायुकोष्ठिकाओं (Alveoli) तक पहुँचती है।
चरण 2
चरण 2 – डायाफ्राम का संकुचन अंतःश्वसन के समय डायाफ्राम संकुचित होकर नीचे की ओर चपटा हो जाता है। इससे वक्ष गुहा का अनुदैर्ध्य (longitudinal) आयतन बढ़ जाता है।
चरण 3
चरण 3 – पसलियों की गति बाह्य इंटरकॉस्टल मांसपेशियाँ संकुचित होकर पसलियों और स्टर्नम को ऊपर और बाहर की ओर उठाती हैं। इससे वक्ष गुहा का पृष्ठ-अधर (dorso-ventral) आयतन बढ़ता है।
चरण 4
चरण 4 – फेफड़ों में दाब का परिवर्तन वक्ष गुहा का आयतन बढ़ने से फेफड़ों का आयतन बढ़ता है और अंदर का अंतःफुफ्फुसीय दाब वायुमंडलीय दाब से कम हो जाता है, जिससे बाहरी वायु फेफड़ों में खिंचती है।
चरण 5
चरण 5 – Alveoli में गैसों का विनिमय Alveoli में पहुँचने पर आंशिक दाब प्रवणता के कारण O₂ विसरित होकर रक्त केशिकाओं में जाती है, जबकि रक्त में उपस्थित अतिरिक्त CO₂ विसरित होकर Alveoli में आ जाती है।
चरण 6
चरण 6 – ऑक्सीजन का रक्त द्वारा परिवहन रक्त में प्रवेश करने वाली अधिकांश O₂ लाल रक्त कणिकाओं (RBC) के हीमोग्लोबिन से जुड़कर ऑक्सीहीमोग्लोबिन (HbO₂) बनाती है और ऊतकों तक पहुँचती है।
चरण 7
चरण 7 – ऊतकों में ऑक्सीजन का उपयोग कोशिका स्तर पर O₂ हीमोग्लोबिन से अलग होकर कोशिकाओं में जाती है, जहाँ इसका उपयोग पोषक तत्वों के ऑक्सीकरण और जैव-ऊर्जा (ATP) के निर्माण में होता है।
चरण 8
चरण 8 – कार्बन डाइऑक्साइड का निर्माण कोशिकीय उपापचय के दौरान CO₂ उप-उत्पाद के रूप में बनती है। यह ऊतकों से रक्त में विसरित होती है और बाइकार्बोनेट एवं अन्य रूपों में फेफड़ों तक पहुँचती है।
चरण 9
चरण 9 – उच्छ्वसन (Expiration) डायाफ्राम शिथिल होकर पुनः गुंबदाकार हो जाता है और पसलियाँ नीचे आ जाती हैं। वक्ष गुहा का आयतन घटने से फेफड़ों का दाब बढ़ता है और CO₂ युक्त वायु बाहर निकल जाती है।
चरण 10
चरण 10 – श्वसन चक्र की पुनरावृत्ति वायु के अंदर आने, विनिमय और बाहर जाने का यह संपूर्ण चक्र अनवरत चलता रहता है, जिससे शरीर की प्रत्येक कोशिका को निरंतर ऊर्जा प्राप्त होती रहती है।

श्वसन आयतन एवं क्षमताएँ (Respiratory Volumes & Capacities)

मापन उपकरण: स्पाइरोमीटर (Spirometer)

श्वसन आयतन (Respiratory Volumes)

1. ज्वारीय आयतन (Tidal Volume – TV): सामान्य शांत श्वास में ली या छोड़ी गई वायु का आयतन।
मान: ~ 500 mL

2. अंतःश्वसनीय आरक्षित आयतन (IRV): सामान्य अंतःश्वसन के बाद बलपूर्वक अंदर खींची जा सकने वाली अतिरिक्त वायु।
मान: ~ 3000 mL

3. उच्छ्वसनीय आरक्षित आयतन (ERV): सामान्य उच्छ्वसन के बाद बलपूर्वक बाहर निकाली जा सकने वाली अतिरिक्त वायु।
मान: ~ 1100 mL

4. अवशिष्ट आयतन (Residual Volume – RV): अधिकतम बलपूर्वक उच्छ्वसन के बाद भी फेफड़ों में शेष बची वायु, जो फेफड़ों को पिचकने से बचाती है।
मान: ~ 1200 mL

श्वसन क्षमता (Respiratory Capacities)

1. अंतःश्वसनीय क्षमता (Inspiratory Capacity – IC): सामान्य उच्छ्वसन के बाद अधिकतम ली जा सकने वाली वायु।
IC = TV + IRV = 500 + 3000 ≈ 3500 mL

2. कार्यात्मक अवशिष्ट क्षमता (Functional Residual Capacity – FRC): सामान्य उच्छ्वसन के बाद फेफड़ों में शेष कुल वायु।
FRC = ERV + RV = 1100 + 1200 ≈ 2300 mL

3. जीवन क्षमता (Vital Capacity – VC): अधिकतम अंतःश्वसन के बाद अधिकतम बाहर निकाली जा सकने वाली कुल वायु। फेफड़ों की कार्यक्षमता का मुख्य सूचक।
VC = IRV + TV + ERV = 3000 + 500 + 1100 ≈ 4600 mL

4. कुल फुफ्फुसीय क्षमता (Total Lung Capacity – TLC): अधिकतम अंतःश्वसन के बाद फेफड़ों में समा सकने वाली वायु की कुल अधिकतम मात्रा।
TLC = VC + RV = 4600 + 1200 ≈ 5800 mL

निष्कर्ष

श्वसन आयतन एवं क्षमताएँ फेफड़ों के स्वस्थ संचालन, गैस विनिमय की दक्षता तथा श्वसन विकारों के नैदानिक परीक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण शारीरिक मानक हैं।